यह फैसला जस्टिस इरशाद अली की एकल पीठ ने विपिन मिश्रा समेत 24 शिक्षकों की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति एकीकृत शिक्षा यानी IEDC योजना के तहत जिला स्तर पर गठित चयन समितियों के माध्यम से रिसोर्स टीचर के रूप में की गई थी। इन शिक्षकों का कहना था कि लंबे समय से काम करने के बावजूद उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में बेहद कम मानदेय मिल रहा है।
नियमित शिक्षकों जैसा ही काम, लेकिन कम भुगतान
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक वे सरकारी स्कूलों में विशेष जरूरत वाले बच्चों की शिक्षा के साथ कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं। इनमें बच्चों की शैक्षिक क्षमता का आकलन, काउंसिलिंग, पुनर्वास संबंधी सहायता और उनकी प्रगति पर लगातार नजर रखना शामिल है।
शिक्षकों का तर्क था कि जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र काफी हद तक नियमित विशेष शिक्षकों के समान होने के बावजूद उन्हें संविदा कर्मियों की तरह करीब 6 हजार रुपये का मानदेय दिया जा रहा था। इसी असमानता को लेकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट ने माना, योग्यता और सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता संबंधित पद के लिए जरूरी योग्यता रखते हैं और लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कोर्ट ने IEDC योजना के प्रावधानों का भी उल्लेख किया, जिसमें विशेष शिक्षकों को संबंधित श्रेणी के नियमित शिक्षकों के अनुरूप वेतनमान देने की व्यवस्था का हवाला दिया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संविदा आधार पर नियुक्त होने के कारण किसी योग्य कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। समान कार्य और जिम्मेदारी की स्थिति में वेतन से जुड़े अधिकारों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार वेतन के साथ मिलेंगे दूसरे सेवा लाभ
हाईकोर्ट के आदेश का असर केवल वेतनमान तक सीमित नहीं रहेगा। अदालत ने संबंधित शिक्षकों को सालाना वेतन वृद्धि, अनुमन्य अवकाश, महिला शिक्षकों के लिए मातृत्व लाभ और सेवा की निरंतरता समेत अन्य निर्धारित सेवा सुविधाएं देने का भी निर्देश दिया है।
राज्य सरकार को अदालत के आदेश का पालन करने के लिए चार महीने का समय मिला है। अब इस अवधि में संबंधित विभाग को विशेष और रिसोर्स शिक्षकों की सेवा शर्तों और वेतनमान को लेकर जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

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