क्या है क्रायोजेनिक इंजन?
क्रायोजेनिक इंजन एक प्रकार का रॉकेट इंजन होता है जिसमें ईंधन और ऑक्सीकारक (oxidizer) दोनों को बेहद कम तापमान पर तरल रूप में रखा जाता है। यह तापमान –150°C से –250°C तक हो सकता है। आमतौर पर, लिक्विड हाइड्रोजन (LH2) और लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) का प्रयोग किया जाता है। इस इंजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अत्यधिक थ्रस्ट और दक्षता प्रदान करता है, जो उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस कक्षा (GTO) तक पहुंचाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
1.अमेरिका (USA)
अमेरिका ने इस क्षेत्र में सबसे पहले और सबसे अधिक प्रगति की। नासा ने Saturn V रॉकेट के जरिए चंद्रमा पर मानव भेजने के लिए क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग किया था। आज SpaceX और Blue Origin जैसी निजी कंपनियां भी इस तकनीक में विश्वस्तरीय काम कर रही हैं। Space Shuttle का मुख्य इंजन (SSME), और अब SLS मिशन में प्रयुक्त इंजन इसी तकनीक पर आधारित हैं।
2.रूस (Russia)
रूस (पूर्व सोवियत संघ) ने Cold War के दौरान इस तकनीक में गहरी महारत हासिल की। उनका RD-0120 इंजन, जिसे Energia रॉकेट में प्रयोग किया गया, विश्व के सर्वश्रेष्ठ क्रायोजेनिक इंजनों में गिना जाता है। आज भी रूस इस तकनीक में आत्मनिर्भर है और इसे निर्यात भी करता है।
3.फ्रांस (ESA के तहत – यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी)
फ्रांस यूरोपीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व करता है और Arianespace इसकी प्रमुख कंपनी है। Ariane-5 रॉकेट का HM7B क्रायोजेनिक इंजन, और अब Ariane-6 में विकसित किया गया Vinci इंजन, इसकी तकनीकी श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। यूरोप ने इस तकनीक के जरिए वैश्विक लॉन्च मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।
4. जापान (Japan)
जापान ने JAXA (Japan Aerospace Exploration Agency) के माध्यम से इस तकनीक का सफल विकास किया है। उनके H-IIA और H-IIB रॉकेट क्रायोजेनिक इंजन से लैस हैं। LE-5 और LE-7 इंजन जापान की तकनीकी क्षमता का प्रमाण हैं। जापान अपनी सटीकता और विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है।
5. चीन (China)
चीन ने तेजी से इस तकनीक में पकड़ बनाई और अब वह अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। Long March-5 जैसे भारी रॉकेट YF-75 और YF-77 क्रायोजेनिक इंजनों का प्रयोग करते हैं। चीन अब चंद्रमा और मंगल जैसे मिशनों में भी इस तकनीक का प्रभावी उपयोग कर रहा है।
6.भारत (India)
भारत के लिए यह तकनीक एक संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी है। 1990 के दशक में अमेरिका के दबाव के चलते रूस से तकनीक ट्रांसफर नहीं हो सकी, लेकिन इसरो (ISRO) ने हार नहीं मानी। लगभग दो दशकों की मेहनत के बाद भारत ने GSLV-D5 मिशन में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन CE-7.5 का सफल उपयोग किया। अब GSLV Mk III में प्रयुक्त CE-20 इंजन पूरी तरह भारतीय है।

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