रूस और चीन का महा धमाका! अमेरिका की उड़ी नींद!

नई दिल्ली। रूस और चीन के बीच आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार पिछले तीन दशकों में कई गुना बढ़कर 200 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। इस बढ़ते कारोबार ने दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को भी नई मजबूती दी है।

रूस की ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी रोसनेफ्ट के प्रमुख इगोर सेचिन के मुताबिक, रूस और चीन मिलकर दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी रखते हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार में स्थानीय मुद्राओं यानी रूबल और युआन का इस्तेमाल भी काफी बढ़ा है, जिससे पश्चिमी मुद्राओं पर निर्भरता कम हुई है।

ऊर्जा कारोबार बना सबसे बड़ा आधार

रूस चीन के लिए तेल और कोयले का प्रमुख सप्लायर है। चीन के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 23 फीसदी बताई जाती है। वहीं चीन के कोयला आयात में भी रूस की महत्वपूर्ण भूमिका है। दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा से जुड़े कारोबार में भी सहयोग बढ़ रहा है।

भारत-रूस व्यापार से कितना आगे?

भारत और रूस का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है और करीब 70 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है। दोनों देशों ने 2030 तक इसे 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, फिलहाल चीन-रूस व्यापार भारत-रूस कारोबार से काफी आगे है।

भारत रूस से मुख्य रूप से कच्चा तेल, कोयला और उर्वरक खरीदता है, जबकि दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक सामान और अन्य उत्पाद रूस को निर्यात करता है। तेल आयात अधिक होने के कारण भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा भी बड़ा है।

वहीं भारत और रूस ने स्थानीय मुद्रा में भुगतान को भी बढ़ावा दिया है। इससे दोनों देशों के कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश तेज हुई है। रूस-चीन की बढ़ती आर्थिक और ऊर्जा साझेदारी अब वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में भी बड़ा बदलाव दिखा रही है।

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