इस संबंध में अपर मुख्य सचिव (बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा) पार्थ सारथी सेन शर्मा ने शासनादेश जारी करते हुए सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों को निर्देश भेज दिए हैं। शासन ने 10 दिन के भीतर पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।
क्या है आदेश का उद्देश्य?
शासन के अनुसार, हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में शिक्षक और शिक्षणेत्तर कर्मचारी अपने मूल विद्यालयों से हटाकर विभिन्न कार्यालयों, शिक्षा निदेशालयों, बीएसए कार्यालयों और अन्य संस्थानों में संबद्ध किए गए थे। यह प्रक्रिया कई मामलों में नियमों के विरुद्ध की गई थी और अक्सर प्रभावशाली सिफारिशों के कारण ऐसे आदेश जारी हुए थे।
नए शासनादेश में कहा गया की “शासन की अनुमति के बिना किसी भी शिक्षक या कर्मचारी को उसके मूल पद से इतर कहीं संबद्ध नहीं किया जाएगा। जो आदेश पहले से जारी हैं, उन्हें तत्काल निरस्त किया जाए और संबंधित कर्मियों को उनके मूल स्थानों पर भेजा जाए।”
कितने कर्मी प्रभावित होंगे?
शासन के आंकड़ों के मुताबिक, बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग में लगभग 4,500 शिक्षक और शिक्षणेत्तर कर्मचारी विभिन्न स्थानों पर संबद्ध होकर कार्य कर रहे हैं। इनमें कई ऐसे भी शामिल हैं जो वर्षों से अपने विद्यालयों में शिक्षण कार्य से दूर हैं। अब सभी को अपने मूल विद्यालयों में लौटना होगा।
कठोरता के साथ पारदर्शिता पर जोर
अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने आदेश में यह भी चेतावनी दी है कि भविष्य में किसी अधिकारी द्वारा शासन की अनुमति के बिना ऐसे संबद्धीकरण किए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह कदम शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में उठाया गया है।
शासन का मानना है कि लंबे समय से कार्यालयों या संस्थानों में संबद्ध रहकर कुछ कर्मचारी और शिक्षक शिक्षण कार्य से दूर हो गए थे, जिससे विद्यालयों में अध्यापक की कमी और कार्यकुशलता पर असर पड़ रहा था। इसके अलावा, ऐसे संबद्धीकरणों के माध्यम से कुछ मामलों में भ्रष्टाचार और पक्षपात की शिकायतें भी सामने आई थीं। इस आदेश से न केवल शिक्षण व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि ऐसे अनुचित लाभ उठाने वाले तंत्र पर भी अंकुश लगेगा।

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