भारत को मिली NMFS मंजूरी का महत्व
अमेरिका की यह मंजूरी भारत के समुद्री खाद्य निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण गैर-टैरिफ बाधा को दूर करने जैसा है। NMFS का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मछली पकड़ने के तरीके समुद्री स्तनधारियों जैसे व्हेल, डॉल्फिन और सील को नुकसान न पहुंचाएं। इसके तहत निर्यातक देशों को यह साबित करना होता है कि उनके मत्स्य पालन में अमेरिकी नियमों का पालन हो रहा है।
भारत को इस मंजूरी के मिलने का एक बड़ा फायदा यह होगा कि अमेरिका में भारत के झींगा और अन्य सीफूड उत्पादों की पहुंच और मांग बढ़ेगी। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा समुद्री खाद्य निर्यात बाजार है। वित्त वर्ष 2025 में भारत का लगभग 7.39 अरब डॉलर का समुद्री खाद्य निर्यात हुआ, जिसमें से करीब 2.68 अरब डॉलर की खेप अमेरिका को गई।
टैरिफ बाधा बनी चुनौती
हालांकि NMFS की मंजूरी मिलने के बावजूद, अमेरिका ने भारत के लिए 50% तक के टैरिफ लगाए हुए हैं, जो भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बाजार में पीछे कर रहे हैं। इस कारण अमेरिका में भारतीय झींगा की कीमत इक्वाडोर, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के मुकाबले महंगी पड़ती है।
सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष एलेक्स के निनान ने इस पहल को सकारात्मक कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि जब तक टैरिफ की समस्या बनी रहेगी, भारतीय निर्यातकों को वास्तविक लाभ मिलना कठिन होगा।
अमेरिकी समुद्री स्तनधारियों की सुरक्षा और निर्यात नियम
अमेरिका में समुद्री स्तनधारियों की सुरक्षा के लिए "मरीन मैमल प्रोटेक्शन एक्ट" (MMPA) लागू है, जिसका मकसद इन जीवों और उनके आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह कानून अमेरिका के जलक्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि जिन देशों के समुद्री उत्पाद अमेरिका को निर्यात होते हैं, उन पर भी लागू होता है।
2017 में अमेरिकी NMFS ने यह नियम लागू किया कि सभी निर्यातक देशों को यह प्रमाण देना होगा कि उनके मत्स्य पालन के तरीकों से समुद्री स्तनधारियों को न्यूनतम नुकसान हो रहा है। इस प्रक्रिया के तहत भारत को सफल प्रमाणन मिला है, जिससे यह दिखाता है कि भारत टिकाऊ और जिम्मेदार मत्स्य पालन के मानकों पर खरा उतरता है।
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