चीन पर मेहरबान हुआ भारत! अमेरिका की बढ़ी बेचैनी

नई दिल्ली। हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन अब इनमें धीरे-धीरे बदलाव के संकेत दिख रहे हैं। भारत सरकार द्वारा चीन समेत कई देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर वर्षों से लगे एंटी-डंपिंग शुल्क को हटाने का फैसला इस बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह फैसला सिर्फ व्यापारिक रणनीति नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और आर्थिक दबावों के बीच संतुलन साधने की भारत की सूझबूझ भरी चाल भी है।

क्या है एंटी-डंपिंग शुल्‍क और क्यों लगाया जाता है?

एंटी-डंपिंग शुल्‍क वह कर है जो किसी देश द्वारा तब लगाया जाता है जब कोई विदेशी कंपनी अपनी घरेलू कीमत से बहुत कम कीमत पर उत्पाद निर्यात करती है। इससे स्थानीय उद्योग को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। भारत ने यह शुल्क वर्ष 2008 में चीन के कई उत्पादों पर लगाया था, खासतौर पर ऑटो उपकरणों और औद्योगिक कच्चे माल पर, ताकि घरेलू निर्माता वैश्विक दबाव से सुरक्षित रह सकें।

17 साल बाद खत्म किया गया यह शुल्क

सरकार ने जिन उत्पादों पर एंटी-डंपिंग शुल्‍क हटाया है, उनमें मुख्य रूप से ट्रक-बस के भारी उपकरण, स्टियरिंग, एक्सेल बीम, पॉलिस्टर और नॉयलॉन धागे, खनन क्षेत्र में उपयोग होने वाली बॉल्स और टेम्‍पर्ड ग्लास शामिल हैं। इनका उपयोग औद्योगिक निर्माण में होता है। सरकार का उद्देश्य साफ है की घरेलू उत्पादन को प्रतिस्पर्धी बनाना और निर्माण लागत को कम करना। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) को दी जानकारी में भारत ने स्पष्ट किया है कि वह व्यापार में संरक्षणवाद की नीति को सीमित करते हुए अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल बनाना चाहता है।

अमेरिका की बेचैनी: कूटनीति का दबाव

भारत और अमेरिका के रिश्तों में बीते समय में कुछ खटास आई है, खासकर व्यापारिक टैरिफ और रणनीतिक मामलों को लेकर। इस बदलते परिदृश्य में भारत के लिए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी हो गया है। ट्रेड थिंक टैंक GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, भारत के लिए औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बनाए रखना और कूटनीतिक रिश्तों में संतुलन लाना एक कठिन लेकिन आवश्यक कार्य है। यही कारण है कि भारत चीन के साथ आर्थिक रिश्तों को सुधारने की दिशा में सक्रियता दिखा रहा है।

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