युद्ध की महंगी कीमत: रूस को भुगतना पड़ रहा भारी नुकसान

न्यूज डेस्क। यूक्रेन में जारी संघर्ष के चलते रूस को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। कई रिपोर्ट्स ये बतलाती हैं की रूसी तेल उद्योग पर सख्त पश्चिमी प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव और करेंसी के उतार-चढ़ाव ने तेल उत्पादन और ड्रिलिंग गतिविधियों को प्रभावित किया है। 2025 में रूसी तेल कंपनियों ने अपने ड्रिलिंग अभियान को तीन साल के सबसे निचले स्तर तक घटा दिया है।

ड्रिलिंग में गिरावट

औद्योगिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 में रूस में कुल ड्रिलिंग लगभग 29,140 किलोमीटर रही, जो 2024 के मुकाबले 3.4% कम है। साल की शुरुआत में तो सक्रियता थी, लेकिन जून से गतिविधियाँ धीमी होने लगीं और दिसंबर में सालाना आधार पर गिरावट लगभग 16% दर्ज की गई। इस कमी का असर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर पड़ सकता है और भारत समेत तेल आयातक देशों के लिए कीमतों में अस्थिरता ला सकता है।

रूस के तेल उत्पादकों पर दबाव

तेल उत्पादन पर यह असर मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और ब्रेंट के मुकाबले रूसी तेल पर भारी छूट, मजबूत रूबल से निर्यात आय में कमी, लॉजिस्टिक और फाइनेंसिंग की चुनौतियाँ, वैश्विक मांग में कमजोरी। रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी प्रमुख कंपनियाँ इन दबावों का सामना कर रही हैं। छूट की बढ़ती मांग और कम प्रॉफिटेबिलिटी के कारण कंपनियां कैश-प्रिज़र्वेशन मोड में काम कर रही हैं।

इसका वैश्विक प्रभाव, युद्ध कीमत

दरअसल, रूस की ड्रिलिंग में कमी से अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें अस्थिर हो सकती हैं, जिसका सीधा असर पेट्रोलियम उत्पादों और ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि यह रूस के लिए यूक्रेन युद्ध की भारी आर्थिक कीमत का संकेत है। कम उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय दबाव न केवल रूस की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में भी अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।

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