क्या है अमेरिका का नया कदम?
सितंबर के आखिरी हफ्ते में, अमेरिका के वाणिज्य विभाग की इकाई Bureau of Industry and Security (BIS) ने एक नई नियमावली जारी की। इस नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी ब्लैकलिस्टेड कंपनी की 50% या उससे अधिक स्वामित्व वाली सब्सिडियरी कंपनियाँ स्वचालित रूप से प्रतिबंधित मानी जाएंगी। इसका सीधा मतलब है कि ऐसी कंपनियाँ अमेरिकी तकनीक, उपकरण या सेवाएं खरीदने के लिए अब विशेष लाइसेंस के अधीन होंगी।
इस संशोधन से न केवल तकनीकी व्यापार प्रभावित होगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन को भी झटका लग सकता है। अमेरिका की इस नीति का सबसे बड़ा असर चीन की कंपनियों पर पड़ने की संभावना है, क्योंकि वर्तमान में अमेरिका की ब्लैकलिस्ट में 1,100 से अधिक चीनी संस्थाएं शामिल हैं।
चीन की तीखी प्रतिक्रिया
चीन ने इस फैसले को अनुचित और भेदभावपूर्ण करार दिया है। बीजिंग के वाणिज्य मंत्रालय ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि यह कदम वैध कारोबारी गतिविधियों में हस्तक्षेप है और वैश्विक व्यापार नियमों के खिलाफ है। चीन का मानना है कि अमेरिका की यह नीति न सिर्फ उसकी कंपनियों को निशाना बना रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक स्थिरता को भी खतरे में डाल रही है।
रेयर अर्थ्स पर चीन का पलटवार
अमेरिका के इस फैसले के बाद चीन ने भी रणनीतिक तौर पर प्रतिक्रिया दी। बीजिंग ने रेयर अर्थ्स (Rare Earths) के निर्यात पर नियंत्रण को कड़ा कर दिया है। ये दुर्लभ खनिज उच्च तकनीकी उत्पादों के निर्माण में बेहद आवश्यक होते हैं और वैश्विक सप्लाई में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है। अमेरिका में इसे चीन की तरफ से एक रणनीतिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है।

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