वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में चीन ने अपनी सेंट्रल बैंक (पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना - PBOC) के माध्यम से रिकॉर्ड स्तर पर सोने का भंडारण किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैश्विक आर्थिक संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की दिशा में चीन की सुनियोजित चाल है।
डॉलर से दूरी, गोल्ड बना ‘सुरक्षित हथियार’
अमेरिकी डॉलर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भंडार मुद्रा के रूप में हावी रहा है, लेकिन चीन इस वर्चस्व को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश में है। अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के मुख्य अर्थशास्त्री टॉर्स्टन स्लोक के अनुसार, “सोने की लगातार खरीद के पीछे चीन की मंशा सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि वैश्विक मुद्रा व्यवस्था को प्रभावित करना है।”
उन्होंने बताया कि चीन की आक्रामक खरीदारी, घरेलू निवेशकों की बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग के चलते सोने के दाम अब रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। दुनिया भर में कई देश अब डॉलर के बजाय गोल्ड को रिजर्व एसेट के रूप में अपनाने पर विचार कर रहे हैं।
चीन की गोल्ड रणनीति: आंकड़ों में ताकत
सितंबर 2025 तक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) के पास कुल 2,303 टन सोना दर्ज है। यह चीन के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का 7.7% हिस्सा है। वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार, इसकी कीमत करीब 283 अरब डॉलर आंकी जा रही है। सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमत अब 4,200 डॉलर प्रति औंस से ऊपर पहुंच चुकी है, जिसमें चीन की खरीदारी की बड़ी भूमिका है। चीन पिछले 11 महीनों से लगातार सोना खरीद रहा है, और यही प्रवृत्ति अब अन्य देशों की केंद्रीय बैंकों में भी देखी जा रही है।
डॉलर की बादशाहत पर मंडरा रहा खतरा
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की यह नीति “डेडॉलराइजेशन” की दिशा में एक ठोस कदम है। कई देश अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों से बचने के लिए डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं। कमोडिटी विश्लेषकों के अनुसार, अगर चीन इसी गति से गोल्ड रिजर्व बढ़ाता रहा, तो आने वाले वर्षों में डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर पड़ सकती है। सोना एक ऐसा एसेट है जिस पर किसी देश का सीधा नियंत्रण नहीं होता, इसलिए इसे राजनीतिक रूप से सुरक्षित मुद्रा विकल्प माना जा रहा है।

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