सरकार की इस घोषणा से राज्य के हजारों कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे लंबे समय से बकाया डीए को लेकर आंदोलन कर रहे थे। चुनाव की घोषणा से पहले आए इस फैसले को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
लंबे समय से चल रहा था डीए विवाद
पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारियों और राज्य सरकार के बीच डीए को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा है। कर्मचारी संगठन केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर महंगाई भत्ता देने की मांग कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर मामला पहले कोलकाता हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। मई 2022 में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समान डीए दिया जाए। हालांकि राज्य सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत के निर्देश और भुगतान का मुद्दा
पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को बकाया डीए का 25 प्रतिशत भुगतान करने का निर्देश दिया था। लेकिन राज्य सरकार ने वित्तीय दबाव का हवाला देते हुए तय समय सीमा में भुगतान करने में असमर्थता जताई और अतिरिक्त समय की मांग की थी। इस बीच कर्मचारी संगठनों ने आंदोलन और हड़ताल की भी चेतावनी दी थी। इसके जवाब में राज्य सरकार ने ‘नो वर्क, नो पे’ की नीति लागू करने की बात कही थी, जिससे विवाद और बढ़ गया था।
विपक्ष ने उठाए सवाल
सरकार की इस घोषणा पर विपक्ष ने भी प्रतिक्रिया दी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने इस फैसले को चुनाव से पहले किया गया कदम बताया। उनका आरोप है कि राज्य सरकार ने लंबे समय तक कर्मचारियों की मांगों को नजरअंदाज किया और अब चुनाव से पहले घोषणा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है।
डीए में बड़ा अंतर बना हुआ
फिलहाल पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों को 1 अप्रैल 2025 से 18 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिल रहा है, जिसमें हाल ही में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी जोड़ी गई है। दूसरी ओर केंद्र सरकार के कर्मचारियों को इससे काफी अधिक डीए मिल रहा है।
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