चीन-रूस ने कर दिया खेल! अमेरिका की बढ़ी टेंशन, अब भारत क्या करेगा?

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर का दबदबा अभी कायम है, लेकिन चीन और रूस के बीच बढ़ता स्थानीय मुद्रा में कारोबार वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत दे रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने चीन के साथ व्यापार में युआन और रूबल के इस्तेमाल को काफी बढ़ाया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के मुताबिक, दोनों देशों के बीच 90% से ज्यादा व्यापार का भुगतान रूबल और युआन में हो रहा है।

चीन-रूस का बढ़ता युआन-रूबल कारोबार

रूस के लिए चीन अब बेहद अहम व्यापारिक साझेदार है। ऊर्जा समेत कई बड़े सौदों में डॉलर की जगह दोनों देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ा है। इसी के साथ चीन का CIPS और रूस का SPFS जैसे भुगतान ढांचे भी पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क के बाहर लेनदेन के विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। IMF के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में दुनिया के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% थी। इसके मुकाबले चीनी युआन की हिस्सेदारी करीब 2% है। यानी चीन-रूस की पहल महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन अभी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को खत्म करने की स्थिति नहीं बनी है।

अमेरिका के लिए चुनौती कितनी बड़ी?

चीन की ताकत उसके विशाल व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में है। अगस्त 2026 में चीन का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 3.438 ट्रिलियन डॉलर था, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। उसी महीने युआन डॉलर के मुकाबले 0.49% मजबूत हुआ। इसलिए अगर चीन और उसके व्यापारिक साझेदार स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बढ़ाते हैं, तो लंबे समय में डॉलर की मांग के कुछ हिस्से पर असर पड़ सकता है।

भारत के लिए क्या है बड़ा मौका?

भारत के लिए यह बदलाव चुनौती के साथ अवसर भी लेकर आता है। रूस के साथ भारत ने रुपये-रूबल आधारित भुगतान व्यवस्था को मजबूत किया है। सितंबर 2026 में रूसी बैंकिंग अधिकारियों ने बताया कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार का करीब 96% हिस्सा रुपये और रूबल में निपट रहा है। भारत-रूस व्यापार 2024 में रिकॉर्ड करीब 70 अरब डॉलर तक पहुंचा था।

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