भारत का अमेरिकी तेल की ओर रुझान
ऊर्जा परामर्श कंपनी केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 27 अक्टूबर तक भारत ने अमेरिका से प्रतिदिन 5.40 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया, जो 2022 के बाद का सबसे ऊँचा स्तर है। अनुमान है कि अक्टूबर के अंत तक यह आंकड़ा 5.75 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुँच सकता है। यह आयात स्तर इस साल के औसत (करीब 3 लाख बैरल प्रति दिन) की तुलना में लगभग दोगुना है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह वृद्धि आर्थिक और रणनीतिक दोनों कारणों से हुई है। एक ओर, ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल के दामों में बढ़ते अंतर ने अमेरिकी तेल को सस्ता और आकर्षक बनाया, वहीं दूसरी ओर चीन की मांग घटने से भारत को खरीद का बड़ा अवसर मिला।
रूस अभी भी शीर्ष पर, लेकिन रुझान में बदलाव
रूस फिलहाल भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। इसके बाद इराक और सऊदी अरब का स्थान आता है। फिर भी, अमेरिकी तेल की ओर भारत का झुकाव यह दर्शाता है कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना चाहता है, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न रहे, खासकर ऐसे समय में जब रूसी तेल कंपनियों पर पश्चिमी प्रतिबंध और बढ़ रहे हैं।
दरअसल, अगस्त में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत से आयातित कुछ वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक के टैरिफ लगाए गए थे, जिनमें 25 प्रतिशत शुल्क रूसी तेल की खरीद जारी रखने की वजह से लगाया गया था। ऐसे में अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाना भारत की एक संतुलनकारी रणनीति भी मानी जा रही है, जिससे व्यापारिक तनाव कम किया जा सके।
अमेरिका से तेल खरीद क्या यह रुझान स्थायी रहेगा?
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह उछाल अल्पकालिक हो सकता है। अमेरिकी तेल का परिवहन खर्च अधिक है, और इसकी हल्की गुणवत्ता भारतीय रिफाइनरियों की मिश्रित उत्पादन रणनीति के लिए हर बार उपयुक्त नहीं होती। फिर भी, यह बदलाव भारत की तेल खरीद में लचीलापन और बाज़ार के उतार-चढ़ाव को तुरंत साधने की क्षमता को दर्शाता है।

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