चुनाव टालने वाले आदेशों पर कोर्ट सख्त
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन सरकारी आदेशों पर सवाल उठाए, जिनके जरिए पंचायत चुनाव को आगे बढ़ाया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेश उस कानूनी प्रावधान के आधार पर जारी किए गए थे, जिसे पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव में अनावश्यक देरी संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है।
प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने से इनकार
सरकार की ओर से चुनाव में देरी के कारणों में ओबीसी आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट का इंतजार बताया गया था। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित आयोग की रिपोर्ट अभी तक क्यों लंबित है। अदालत ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में आगे भी बनाए रखने से इनकार कर दिया है। इससे प्रदेश के पंचायत प्रतिनिधियों के बीच हलचल बढ़ गई है।
चुनाव कराने को तैयार चुनाव आयोग
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने बताया कि मतदाता सूची का काम पूरा हो चुका है और चुनाव कराने की तैयारी की जा चुकी है। हालांकि जरूरी व्यवस्थाएं और संसाधन उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। कोर्ट ने सरकार को चुनाव की स्पष्ट समय-सीमा बताने का निर्देश दिया है।
सरकार को देना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आखिरी मौका दिया है। इसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और पंचायत चुनाव कराने की पूरी योजना की जानकारी देनी होगी। यदि सरकार तय निर्देशों का पालन नहीं करती है, तो संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देना पड़ सकता है।
13 जुलाई को अगली सुनवाई
इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को दोपहर 2 बजे होगी। अब सभी की नजरें सरकार के जवाब और पंचायत चुनाव की आगे की प्रक्रिया पर टिकी हैं। इस फैसले के बाद यूपी में ग्राम प्रधानों और पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति और साफ होने की उम्मीद है।
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