भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जल्द मुहर: चीन की बढ़ी चिंता!

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। दोनों देशों ने अधिकांश मुद्दों पर सहमति बना ली है और समझौते की भाषा पर तेजी से काम चल रहा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस संदर्भ में बातचीत सकारात्मक और सुचारू रूप से चल रही है, और कोई नया विवाद इस प्रक्रिया में बाधा नहीं बना है।

गुरुवार को दोनों देशों के वार्ताकारों ने वर्चुअल बैठक के माध्यम से चर्चा की। मार्च से अब तक इस समझौते के पांच दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है। प्रारंभ में योजना थी कि इसे 2025 की शुरुआत में अंतिम रूप दिया जाए। अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष समझौते की डेडलाइन को लेकर गंभीर हैं और प्रक्रिया जल्द पूरी होने की संभावना है।

2030 तक व्यापार को 500 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य

इस समझौते का उद्देश्य 2030 तक भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय व्यापार को वर्तमान 191 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। इस दिशा में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पिछले महीने अमेरिका गए थे और उन्होंने उच्च-स्तरीय व्यापार वार्ता का नेतृत्व किया। उनके साथ विशेष सचिव और मुख्य वार्ताकार राजेश अग्रवाल भी मौजूद थे। इसके पहले अमेरिकी अधिकारी सितंबर में भारत में वाणिज्य विभाग के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा कर चुके हैं।

डेयरी और कृषि मांग पर भारत सतर्क

बातचीत के दौरान अमेरिका ने भारतीय डेयरी और कृषि क्षेत्रों में बाजार खोलने की मांग रखी। भारत ने साफ संकेत दिया कि डेयरी उद्योग में किसी भी प्रकार का विदेशी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। यह क्षेत्र देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बड़ी संख्या में रोजगार जुड़े हैं।

पिछले टैरिफ विवादों का असर

हालांकि, पिछली कुछ घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को चुनौती दी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था, जिसके कुछ दिनों बाद भारत ने रूस से तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया। इसके कारण वैश्विक स्तर पर दोनों देशों के व्यापार संबंधों पर चर्चा हुई थी।

वैश्विक नजर में महत्व

भारत-अमेरिका व्यापार डील न केवल दोनों देशों के आर्थिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि चीन सहित अन्य वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसके प्रभाव की निगाहें हैं। व्यापार में बढ़ोतरी और सहयोग से भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत होगी और वैश्विक बाजार में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।

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