अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस इस क्षेत्र में लंबे समय से मजबूत स्थिति में हैं। अब चीन भी अपनी स्वदेशी इंजन तकनीक को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। जेट इंजन की असली चुनौती केवल इंजन चलाना नहीं, बल्कि उसके लिए टर्बाइन ब्लेड, उच्च तापमान वाली मिश्रधातु, कंप्रेसर और दूसरी बेहद जटिल तकनीकों को बड़े पैमाने पर विकसित करना है।
भारत की स्थिति क्या है?
भारत ने इस क्षेत्र में लंबे समय से अपनी क्षमता विकसित करने की कोशिश की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने कावेरी इंजन विकसित किया है। इस परियोजना के तहत कई प्रोटोटाइप तैयार किए गए और हजारों घंटे परीक्षण भी हुए हैं।
हालांकि कावेरी इंजन मौजूदा रूप में तेजस लड़ाकू विमान की जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त प्रदर्शन हासिल नहीं कर सका। यही वजह है कि तेजस के मौजूदा संस्करणों में विदेशी इंजन का इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल में भी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को तेजस एमके-1ए के लिए अमेरिकी GE Aerospace के F404 इंजन की आपूर्ति हुई है।
अब बदल रही है तस्वीर
भारत अब विदेशी निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी एयरो-इंजन क्षमता पर जोर दे रहा है। फरवरी 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने GTRE का दौरा कर स्वदेशी सैन्य गैस टर्बाइन इंजन परियोजनाओं की समीक्षा की थी। कावेरी इंजन का परीक्षण भी इस दौरान देखा गया। इसके अलावा भारत में भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी के रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।
असली चुनौती अभी बाकी
भारत ने विमान निर्माण, रडार, मिसाइल और दूसरे रक्षा क्षेत्रों में अपनी क्षमता काफी बढ़ाई है, लेकिन पूरी तरह स्वदेशी और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान इंजन बनाना अब भी बड़ी तकनीकी चुनौती है। आने वाले वर्षों में कावेरी से मिली तकनीक और विदेशी कंपनियों के साथ संभावित साझेदारियां भारत को इस क्षेत्र में आगे ले जाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

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