भारत-रूस ने दिया डॉलर को झटका? अमेरिका की बढ़ सकती है चिंता

नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच कारोबार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका लगातार कम होती दिखाई दे रही है। ब्रिक्स सम्मेलन से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने बताया कि रूस और ब्रिक्स देशों के बीच करीब 90 फीसदी भुगतान स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि रूस का मकसद डॉलर को पूरी तरह खत्म करना नहीं है।

रुपये-रूबल से हो रहा बड़ा हिस्सा

भारत और रूस ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए रुपये और रूबल में भुगतान की व्यवस्था विकसित की है। रूसी पक्ष के अनुसार, दोनों देशों के करीब 96 फीसदी व्यापार का भुगतान अब इन दोनों मुद्राओं के जरिए हो रहा है। इससे बड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता घटाने का रास्ता मजबूत हुआ है।

रूस के पास जमा रुपयों का क्या हुआ?

रूस से भारत की भारी ऊर्जा खरीद के कारण रूसी कंपनियों के पास बड़ी मात्रा में भारतीय मुद्रा जमा हो गई थी। इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, यह लंबे समय से चुनौती बना हुआ था। अब रूसी पक्ष का कहना है कि अतिरिक्त रुपये से जुड़ा यह मुद्दा धीरे-धीरे सुलझाया जा रहा है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?

स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ने से भारत और रूस के बीच बड़े कारोबार के लिए हर बार डॉलर की जरूरत कम होगी। खासकर ऊर्जा कारोबार में इसका रणनीतिक महत्व है। हालांकि, इसे डॉलर से पूरी तरह मुक्ति कहना सही नहीं होगा। फिलहाल दोनों देशों की कोशिश भुगतान के वैकल्पिक रास्तों को मजबूत करने की है।

अमेरिका पर क्या होगा इसका बड़ा असर?

भारत-रूस का यह बदलाव अपने आप में डॉलर के अंत का संकेत नहीं है। अमेरिकी मुद्रा अभी भी वैश्विक कारोबार में बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर ब्रिक्स के दूसरे देश भी स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बढ़ाते हैं, तो कुछ क्षेत्रों में डॉलर की मांग कम हो सकती है। इसी वजह से यह मुद्दा आर्थिक के साथ-साथ वैश्विक रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बन गया है।

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