BRICS को लेकर ट्रंप की नाराजगी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार BRICS देशों को डॉलर की भूमिका कमजोर करने की कोशिश के खिलाफ चेतावनी दे चुके हैं। हालांकि BRICS के पास अभी कोई साझा मुद्रा नहीं है और भारत भी डॉलर को हटाने के किसी अभियान का समर्थन नहीं करता। नई दिल्ली का जोर ज्यादा व्यावहारिक सहयोग पर है, जिसमें आपसी व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देना शामिल है।
यही वजह है कि भारत के लिए इस सम्मेलन में संतुलन बनाना बेहद महत्वपूर्ण होगा। एक तरफ रूस और चीन जैसे प्रमुख BRICS सदस्य हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
ईरान की मौजूदगी से टेंशन
इस बार ईरान की भूमिका भी खास है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों की मौजूदगी BRICS के भीतर मतभेदों को भी सामने ला रही है। रिपोर्टों के मुताबिक सम्मेलन से पहले सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया संकट पर साझा बयान को लेकर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
BRICS बैंक क्यों है अहम?
BRICS की ताकत केवल बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं है। न्यू डेवलपमेंट बैंक इसका महत्वपूर्ण संस्थागत आधार है। 2015 में स्थापित इस बैंक ने भारत में अब तक करीब 10 अरब डॉलर की 32 परियोजनाओं के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इनमें मेट्रो और RRTS जैसी परिवहन परियोजनाओं के साथ बुनियादी ढांचे से जुड़े दूसरे काम भी शामिल हैं।
भारत के लिए क्या मायने?
दिल्ली में होने वाला यह सम्मेलन भारत के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत दिखाने का मौका है। रूस, चीन और ईरान के साथ BRICS में काम करते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं होगा। लेकिन अगर भारत आर्थिक सहयोग, स्थानीय व्यापार और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर सहमति बनाने में सफल रहता है, तो BRICS की अध्यक्षता उसके लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि साबित हो सकती है।

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