किडनी ट्रांसप्लांट कैसे होता है? जानिए नई किडनी शरीर में कैसे लगाई जाती है

हेल्थ डेस्क। किडनी शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में शामिल है, जो खून से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने में मदद करती है। जब दोनों किडनियां गंभीर रूप से काम करना बंद कर देती हैं, तो कुछ मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट इलाज का विकल्प बन सकता है। इसमें खराब किडनी को निकालना जरूरी नहीं होता, बल्कि स्वस्थ डोनर की किडनी को मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।

सबसे पहले होती है डोनर और मरीज की जांच

ट्रांसप्लांट से पहले मरीज और संभावित डोनर की कई जांच की जाती हैं। इनमें ब्लड ग्रुप, टिश्यू मैच, एंटीबॉडी और सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी जांच शामिल हो सकती हैं। डॉक्टर यह भी देखते हैं कि डोनर किडनी देने के लिए चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त है या नहीं। ट्रांसप्लांट के लिए जीवित डोनर या मृत डोनर की किडनी इस्तेमाल की जा सकती है।

पेट के निचले हिस्से में लगाई जाती है नई किडनी

सर्जरी के दौरान डोनर की स्वस्थ किडनी को मरीज के पेट के निचले हिस्से, आमतौर पर श्रोणि क्षेत्र में रखा जाता है। नई किडनी की रक्त वाहिकाओं को मरीज की रक्त नलिकाओं से जोड़ा जाता है, ताकि उसमें खून का प्रवाह शुरू हो सके। इसके बाद किडनी से निकलने वाली यूरेटर को मूत्राशय से जोड़ा जाता है, जिससे पेशाब शरीर से बाहर निकल सके।

सर्जरी के बाद क्यों जरूरी होती हैं दवाएं?

ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को ऐसी दवाएं दी जाती हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित रखें। इसका उद्देश्य शरीर द्वारा नई किडनी को अस्वीकार करने यानी रिजेक्शन के जोखिम को कम करना होता है। इन दवाओं की नियमित निगरानी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार सेवन जरूरी होता है।

रिकवरी में कितना समय लग सकता है?

सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति, किडनी के काम करने और किसी जटिलता के आधार पर अस्पताल में रहने की अवधि अलग-अलग हो सकती है। डिस्चार्ज के बाद भी नियमित जांच, दवाओं और डॉक्टर की निगरानी जारी रहती है। नई किडनी की कार्यक्षमता पर लगातार नजर रखी जाती है।

किडनी ट्रांसप्लांट एक बड़ी सर्जरी है और इसके फायदे व जोखिम मरीज की स्थिति के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए ट्रांसप्लांट का निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टर की जांच और सलाह के बाद ही लिया जाता है।

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