सरकार का मानना है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं। ऐसे में नगर निकायों जैसी संपत्ति कर व्यवस्था पंचायत क्षेत्रों में लागू करना ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था तैयार की जा रही है।
पंचायतों की कमाई का भी रखा जाएगा ध्यान
संपत्ति कर से ग्रामीणों को राहत देने के साथ पंचायतों की आमदनी का रास्ता भी बंद नहीं होगा। नई नियमावली में पंचायतों को स्थानीय सेवाओं और सुविधाओं के बदले शुल्क लेने के विकल्प स्पष्ट किए जाएंगे। इससे पंचायतें अपने स्तर पर राजस्व जुटा सकेंगी और विकास कार्यों के लिए संसाधन बढ़ा सकेंगी।
इन कारोबारों पर लग सकता है टैक्स
नई व्यवस्था में आम ग्रामीण मकानों के बजाय ईंट-भट्ठे, निजी स्कूल, मोबाइल टावर, रेस्टोरेंट, राइस मिल, निजी अस्पताल और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों जैसी गतिविधियों को कर के दायरे में लाने की तैयारी है। व्यावसायिक प्रचार के लिए लगाए जाने वाले होर्डिंग और बैनर पर भी शुल्क या कर का प्रावधान किया जा सकता है।
दरअसल, बिहार में ग्रामीण प्रशासन का दायरा काफी बड़ा है। राज्य में करीब 45,103 गांव और 8,041 पंचायतें हैं। ऐसे में नई व्यवस्था का असर बड़ी ग्रामीण आबादी पर पड़ सकता है। पंचायती राज विभाग अब संशोधित नियमावली का प्रारूप तैयार कर रहा है। प्रस्ताव को आगे कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजे जाने की तैयारी है।

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