आकाश के अलावा भारत की ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर भी कई देशों की दिलचस्पी बढ़ी है। इंडोनेशिया इसके लिए समझौता कर चुका है, जबकि फिलीपींस पहले ही इसे हासिल कर चुका है। वहीं यूएई के साथ ब्रह्मोस सौदे को लेकर बातचीत आगे बढ़ रही है।
आकाश की खासियत ने बढ़ाया भरोसा
आकाश एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय सेनाओं में इस्तेमाल होने के साथ युद्ध परिस्थितियों में भी अपनी क्षमता दिखा चुका है। यह कम दूरी से लेकर मध्यम दूरी के हवाई खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसके आधुनिक संस्करणों में आकाश प्राइम और आकाश-NG शामिल हैं, जिनमें पहले की तुलना में सेंसर और तकनीक को बेहतर किया गया है।
भारत के लिए खास बात यह है कि अब आकाश का अंतरराष्ट्रीय ग्राहक आधार भी बढ़ रहा है। आर्मेनिया पहले ही इसे खरीद चुका है, जबकि ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के जुड़ने से इसका विदेशी बाजार और मजबूत हुआ है।
चीन और रूस के बीच भारत का बढ़ता विकल्प
मध्य एशिया लंबे समय से रूसी हथियारों का बड़ा बाजार रहा है। हालांकि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद हथियारों की आपूर्ति को लेकर कई देशों ने दूसरे विकल्पों पर ध्यान देना शुरू किया है। इसी बीच चीन ने भी इस क्षेत्र में अपनी रक्षा बिक्री बढ़ाई है।
ऐसे माहौल में भारत का आकाश सिस्टम ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के लिए रूस और चीन के अलावा एक तीसरा विकल्प बनकर सामने आया है। इससे मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक और रक्षा क्षेत्र में मौजूदगी बढ़ सकती है।
कम लागत और भरोसेमंद सप्लाई भी बड़ी वजह
आकाश को पश्चिमी देशों के कई एयर डिफेंस सिस्टम की तुलना में कम लागत वाला विकल्प माना जाता है। इसके अलावा भारत में इसका उत्पादन होने से स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, प्रशिक्षण और भविष्य की आपूर्ति को लेकर खरीदारों को भरोसा मिल सकता है।
मध्य एशिया में भारतीय रक्षा प्रणालियों की बढ़ती स्वीकार्यता से यह संकेत भी मिलता है कि भारत अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रक्षा निर्यातक के रूप में अपनी जगह मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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