इससे पहले 2025 में 14 जहाज नौसेना के बेड़े में जुड़े थे, जिनमें एक पनडुब्बी भी शामिल थी। इतनी तेज़ गति से युद्धपोतों का निर्माण और उन्हें सेवा में शामिल किया जाना इस बात का संकेत है कि भारत का स्वदेशी शिपबिल्डिंग सिस्टम पूरी तरह सक्षम और परिपक्व हो चुका है।
नीलगिरी श्रेणी से बढ़ेगी मारक क्षमता
आगामी वर्ष में नौसेना की ताकत बढ़ाने में नीलगिरी श्रेणी के मल्टी-रोल स्टेल्थ फ्रिगेट्स की अहम भूमिका होगी। इस श्रेणी का पहला पोत पहले ही सेवा में आ चुका है, जबकि इसके बाद अन्य उन्नत फ्रिगेट्स को भी चरणबद्ध तरीके से कमीशन किया गया।
2026 में इसी श्रेणी के और युद्धपोत बेड़े में शामिल होने की संभावना है, जिससे नौसेना की निगरानी, रक्षा और आक्रामक क्षमता में बड़ा सुधार होगा। इसके अलावा इक्षाक श्रेणी के सर्वे पोत और निस्तार श्रेणी के डाइविंग सपोर्ट पोत भी नौसेना में जोड़े जाएंगे, जो समुद्र में तकनीकी और बचाव अभियानों को मजबूती देंगे।
आधुनिक निर्माण तकनीक बनी गेमचेंजर
भारतीय नौसेना के इस तेज विस्तार के पीछे सबसे बड़ी वजह है इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन तकनीक। इस पद्धति में जहाजों को बड़े-बड़े ब्लॉक्स में तैयार किया जाता है, जिनका वजन करीब 250 टन तक होता है। बाद में इन ब्लॉक्स को जोड़कर पूरा युद्धपोत तैयार किया जाता है।
निर्माण प्रक्रिया में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस डिजाइन सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जा रहा है, जिससे सामग्री की आपूर्ति, समय-सीमा और तकनीकी फिटिंग की पहले से सटीक योजना बन जाती है। नतीजा यह है कि जहां पहले एक युद्धपोत बनने में 8 से 9 साल लगते थे, वहीं अब यह अवधि घटकर करीब 6 साल रह गई है।
भारत की समुद्री भूमिका होगी और मजबूत
रिकॉर्ड संख्या में युद्धपोतों की एंट्री और आधुनिक तकनीक के उपयोग से भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में न केवल हिंद महासागर क्षेत्र में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी मौजूदगी को और प्रभावशाली बनाएगी। यह कदम भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निर्णायक समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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