यूरोप के प्रतिष्ठित थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के अनुसार दिसंबर में भारत ने रूस से करीब 2.3 अरब यूरो मूल्य का ईंधन खरीदा। यह आंकड़ा नवंबर के 3.3 अरब यूरो की तुलना में काफी कम है। इसी गिरावट के चलते तुर्की भारत से आगे निकलते हुए दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया, जबकि चीन अब भी पहले स्थान पर मजबूती से बना हुआ है।
आयात घटने के पीछे क्या हैं कारण
भारत के रूसी ईंधन आयात में आई कमी का सबसे बड़ा कारण देश की प्रमुख निजी रिफाइनरी रिलायंस इंडस्ट्रीज का फैसला रहा। जामनगर स्थित इस रिफाइनरी ने दिसंबर में रूस से तेल खरीद को लगभग आधा कर दिया। इसके अलावा सरकारी रिफाइनरियों ने भी अपने आयात में करीब 15 प्रतिशत की कटौती की। यह बदलाव ऐसे समय पर आया है, जब अमेरिका ने रूस की बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर नए प्रतिबंध लगाए हैं।प्रतिबंधों के असर से कई भारतीय कंपनियों ने या तो रूसी तेल खरीदना अस्थायी रूप से रोक दिया या उसमें कटौती कर दी।
अमेरिकी दबाव और टैरिफ का असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बना रहे हैं। भारत पर पहले से लगे 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ के चलते कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ऐसे में रूस से आयात में आई गिरावट को अमेरिका के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिससे ट्रंप प्रशासन संतुष्ट नजर आ सकता है।
भारत की तेल जरूरतें और रणनीति
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल से दूरी बना ली थी, जिससे भारत ने छूट वाले रूसी कच्चे तेल की ओर रुख किया। एक समय ऐसा भी आया जब भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हालांकि दिसंबर 2025 में यह हिस्सेदारी घटकर करीब 25 प्रतिशत रह गई, जो नवंबर में 35 प्रतिशत थी। यह गिरावट दिखाती है कि भारत अब ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन के बीच नई रणनीति अपना रहा है।
चीन की बढ़त और वैश्विक तस्वीर
जहां भारत और तुर्की की खरीद में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, वहीं चीन रूस का सबसे बड़ा खरीदार बना रहा। रूस के कुल निर्यात राजस्व का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। चीन ने न केवल कच्चे तेल, बल्कि कोयला और पाइपलाइन गैस का भी बड़े पैमाने पर आयात किया। समुद्री मार्ग से होने वाले तेल आयात में भी चीन की हिस्सेदारी बढ़ी है, खासकर ESPO और यूराल्स ग्रेड कच्चे तेल में।
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