इस कदम का मतलब केवल तकनीक सीखना नहीं है, बल्कि भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन DRDO को यूरोप की अत्याधुनिक सेंसिंग, रडार और सर्विलांस तकनीक तक सीधे पहुँच मिलेगी। इससे भारत के अपने ड्रोन प्रोग्राम जैसे ‘रुस्तम’ और ‘तपस’ को भी नई दिशा मिलेगी।
DRDO और OCCAR का सहयोग
भारत की ओर से DRDO इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहा है, जबकि यूरोप की ओर से इसे OCCAR (Organisation for Joint Armament Cooperation) मैनेज कर रही है। इस साझेदारी के तहत भारत को ड्रोन के डिजाइन और तकनीकी डेटा तक पहुंच प्राप्त होगी। भविष्य में भारत अपनी स्वदेशी तकनीक और सेंसर्स को भी इसमें जोड़ सकता है, जिससे आत्मनिर्भर भारत की पहल को बल मिलेगा।
यूरोड्रोन: जानिए खासियतें
यूरोड्रोन को आधुनिक युद्ध और निगरानी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं:
यह लगातार 40 घंटे तक उड़ान भर सकता है।
45,000 फीट की ऊंचाई से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख सकता है।
2.3 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम, जिसमें हथियार और उच्च तकनीक सेंसर्स शामिल हैं।
इसे रिमोटली पायलेटेड होने के बावजूद सिविल एयरस्पेस में सुरक्षित उड़ान के लिए डिजाइन किया गया है।
इटली के लियोनार्डो कंपनी द्वारा विकसित Gabbiano ES रडार समुद्री और भौगोलिक निगरानी में सक्षम है।
फ्रांस की सैफ्रन कंपनी का EUROFLIR 610 सेंसर इसे दुनिया के सबसे सटीक और बड़े सेंसर्स से लैस बनाता है।

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