पश्चिम एशिया से रूस तक का सफर
परंपरागत रूप से भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर रहा है। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब रूसी तेल भारी छूट पर उपलब्ध होने लगा। इस मौके का फायदा उठाते हुए भारत ने रूस से आयात बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि जहां पहले कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब एक प्रतिशत थी, वहीं यह बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई।
आंकड़ों में भारत और चीन
ऊर्जा और स्वच्छ हवा पर शोध करने वाले यूरोपीय थिंक टैंक ‘सीआरईए’ के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूस से जीवाश्म ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। भारत ने अब तक रूस से करीब 162.5 अरब यूरो का जीवाश्म ईंधन खरीदा, जिसमें कच्चा तेल प्रमुख हिस्सा रहा। वहीं चीन इस सूची में पहले स्थान पर है, जिसने तेल, कोयला और गैस मिलाकर लगभग 293.7 अरब यूरो की खरीदारी की।
अमेरिका और पश्चिम की असहजता
भारत के इस कदम से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में असहजता देखी गई। उनका तर्क रहा कि रूसी तेल खरीद से युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहारा मिलता है। हालांकि भारत ने बार-बार साफ किया कि उसकी प्राथमिकता अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आम उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत देना है। भारत का यह भी कहना है कि उसने अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नहीं किया और खरीद पूरी तरह से वैध ढांचे के भीतर की गई।
रिलायंस का बयान और बाजार की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम में रिलायंस इंडस्ट्रीज का नाम भी चर्चा में रहा। हाल ही में कंपनी ने स्पष्ट किया कि उसने बीते लगभग तीन सप्ताह से रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदा है और जनवरी में भी ऐसी कोई योजना नहीं है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि कुछ टैंकर जामनगर रिफाइनरी के लिए रवाना हैं। स्पष्टीकरण के बावजूद, बाजार में अनिश्चितता का असर रिलायंस के शेयरों पर दिखा और एक ही दिन में शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई, जिससे कंपनी के बाजार मूल्य को बड़ा झटका लगा।

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