अमेरिका के एक्शन से चीन हुआ परेशान, भारत पर भी असर?

नई दिल्ली। वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की सख्त कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। इसका सीधा असर चीन पर तो पड़ा ही है, साथ ही भारत के आर्थिक हित भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। चीन और वेनेजुएला के बीच वर्षों से चला आ रहा तेल और कर्ज का बड़ा समझौता अब अनिश्चितता के दौर में पहुंच गया है।

चीन–वेनेजुएला साझेदारी की शुरुआत कैसे हुई

2000 के दशक की शुरुआत में चीन की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही थी और उसे बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत थी। दूसरी ओर, वेनेजुएला को अपने विकास कार्यों के लिए पूंजी की तलाश थी। उस समय राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहते थे। इसी पृष्ठभूमि में चीन और वेनेजुएला के बीच एक बड़ा रणनीतिक समझौता हुआ।

इस समझौते के तहत चीन ने वेनेजुएला को 100 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज देने का वादा किया, जबकि वेनेजुएला ने तेल के जरिए इस कर्ज को चुकाने की व्यवस्था की। चीनी फंड से वेनेजुएला में रेलवे, बिजली परियोजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए गए। लंबे समय तक यह मॉडल दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहा।

अब क्यों फंसा है यह सौदा

समय के साथ हालात बदल गए। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था कमजोर होती चली गई और चीन को दिए जाने वाले तेल की आपूर्ति में रुकावटें आने लगीं। हालांकि वेनेजुएला ने कर्ज चुकाने की कोशिश की है, लेकिन अब भी करीब 10 अरब डॉलर का भुगतान बाकी बताया जाता है। इसी बीच चीन ने वेनेजुएला को नए कर्ज देना भी बंद कर दिया, क्योंकि अब वह इस देश और उसके तेल पर पहले जैसा निर्भर नहीं रहा।

भारत का भी फंसा है पैसा

इस पूरे घटनाक्रम में भारत को भी नुकसान झेलना पड़ा है। भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड का वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल तेल क्षेत्र में बड़ा निवेश है। इस परियोजना से जुड़ा लगभग 1 अरब डॉलर का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। इसमें एक हिस्सा वर्षों पुराना है, जबकि शेष राशि का ऑडिट तक नहीं हो पाया है। अमेरिकी प्रतिबंधों और वेनेजुएला की राजनीतिक अस्थिरता के चलते न तो भुगतान हो पा रहा है और न ही उत्पादन सामान्य हो सका है।

अमेरिका की सख्ती ने बढ़ाई परेशानी

अमेरिका ने वेनेजुएला पर वर्षों से आर्थिक और तेल संबंधी प्रतिबंध लगाए हुए हैं। हालिया घटनाओं में अमेरिकी सेना की सक्रियता और वेनेजुएला के तेल टैंकरों पर कार्रवाई ने हालात और गंभीर बना दिए हैं। अमेरिकी नेतृत्व का साफ संदेश है कि जब तक वेनेजुएला अपना तेल क्षेत्र विदेशी निवेश के लिए नहीं खोलता, तब तक दबाव जारी रहेगा।

2017 में जब अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगाए और वेनेजुएला अपने सरकारी बॉन्ड पर डिफॉल्ट कर गया, तभी से चीन के लिए अपना पैसा वापस पाना बेहद मुश्किल हो गया था। उस दौर में देश पर चीन का भारी कर्ज था, अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी थी और लाखों लोग पलायन कर चुके थे।

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