हालांकि रूस अब भी भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है, लेकिन जनवरी के पहले पखवाड़े के आंकड़े संकेत देते हैं कि रूसी तेल की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है। इस दौरान रूस से करीब 11.79 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आया, जो पिछले महीने की तुलना में कम और 2025 के औसत से काफी नीचे रहा।
रिफाइनरियों के रुख में दिखा बदलाव
जनवरी के पहले पंद्रह दिनों में केवल इंडियन ऑयल, नायरा एनर्जी और भारत पेट्रोलियम ने ही रूस से तेल खरीदा। देश की सबसे बड़ी निजी रिफाइनरी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस अवधि में रूसी तेल से दूरी बनाए रखी, जबकि पिछले साल वही कंपनी रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीद रही थी। इसके अलावा हिंदुस्तान पेट्रोलियम, एचपीएल-मित्तल एनर्जी और मैंगलोर रिफाइनरी ने भी रूसी कच्चे तेल की खरीद नहीं की।
नए देशों से बढ़ी खरीदारी
रूसी आपूर्ति में आई कमी की भरपाई के लिए भारतीय रिफाइनरियां अब उन देशों से तेल मंगा रही हैं, जिनसे पहले सीमित मात्रा में खरीद होती थी। दो साल के अंतराल के बाद भारत ने दक्षिण अमेरिकी देश गुयाना से फिर से कच्चा तेल आयात किया है। यह देश हाल के वर्षों में बड़े तेल भंडार मिलने के बाद वैश्विक तेल बाजार में तेजी से उभर रहा है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया से तेल खरीद भी बढ़ाई गई है। जनवरी में सऊदी अरब से भारत की खरीद में लगभग एक-तिहाई का इजाफा हुआ, जबकि इराक से आयात में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अफ्रीकी देशों की बढ़ती भूमिका
अफ्रीकी देशों से तेल आयात भी भारत की नई रणनीति का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। नाइजीरिया से आने वाला कच्चा तेल लगभग दोगुना हो गया, जबकि अंगोला से आयात में तीन गुना तक की बढ़ोतरी देखी गई। इससे साफ है कि भारत अब अपने तेल स्रोतों में विविधता लाने पर जोर दे रहा है।
किन देशों से घटा आयात?
जहां एक ओर कई नए देशों से खरीद बढ़ी है, वहीं कुछ जगहों से आयात घटा भी है। संयुक्त अरब अमीरात से आने वाला कच्चा तेल करीब 40 प्रतिशत कम हुआ है। वहीं अमेरिका से तेल आयात लगभग स्थिर बना हुआ है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के कच्चे तेल आयात में आए इस बदलाव की पूरी तस्वीर महीने के अंत तक ही साफ हो पाएगी। लेकिन शुरुआती संकेत यही बताते हैं कि भू-राजनीतिक दबाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच भारत अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ज्यादा संतुलित और विविध रणनीति अपना रहा है।
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