भारत खरीदेगा 'टॉरस' 350E मिसाइल, पाक की उड़ी नींद!

नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना अपनी लंबी दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकती है। जर्मनी की TAURUS KEPD 350E क्रूज मिसाइल को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है, जिसे वायुसेना अपने स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमानों के साथ जोड़ने पर विचार कर रही है। अगर यह सौदा आगे बढ़ता है तो भारत की ‘डीप-स्ट्राइक’ क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

राफेल तक सीमित नहीं रहेगी डीप-स्ट्राइक ताकत

अब तक भारतीय वायुसेना की अत्याधुनिक लंबी दूरी की मारक क्षमता मुख्य रूप से राफेल विमानों और उनसे लैस SCALP-EG मिसाइलों तक सीमित रही है। हालिया सैन्य अभियानों में स्कैल्प मिसाइलों के प्रभावी प्रदर्शन के बाद वायुसेना चाहती है कि ऐसी ही ताकत तेजस Mk1A और भविष्य के तेजस MkII जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म को भी मिले। इसी जरूरत ने टॉरस मिसाइल को एक मजबूत विकल्प बना दिया है।

क्यों खास है टॉरस KEPD 350E?

टॉरस मिसाइल की सबसे बड़ी पहचान इसकी MEPHISTO पेनिट्रेशन तकनीक है। यह तकनीक मिसाइल को यह समझने में सक्षम बनाती है कि उसने कितनी परतों या कितनी मोटी कंक्रीट को पार किया है। इसका मतलब यह हुआ कि दुश्मन का कमांड सेंटर अगर जमीन के नीचे कई मंजिलों में छिपा हो, तब भी मिसाइल सही गहराई पर जाकर विस्फोट कर सकती है। यही वजह है कि इसे बंकर, पुल और अंडरग्राउंड ठिकानों को नष्ट करने में बेहद प्रभावी माना जाता है।

कीमत में बड़ा फायदा

वायुसेना के रणनीतिकारों के लिए लागत भी एक अहम पहलू है। अनुमान के मुताबिक, एक स्कैल्प मिसाइल की कीमत काफी अधिक है, जबकि टॉरस मिसाइल उससे लगभग आधी कीमत में उपलब्ध हो सकती है। यानी समान बजट में ज्यादा मिसाइलें खरीदी जा सकती हैं, जिससे लंबी अवधि में स्ट्राइक क्षमता और स्टॉक दोनों मजबूत होंगे।

रडार से बचने में माहिर

टॉरस मिसाइल केवल ताकतवर ही नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से बेहद स्मार्ट भी है। यह जमीन के बेहद करीब उड़ान भरती है, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे समय रहते पकड़ पाना मुश्किल हो जाता है। पहाड़ी इलाकों और घाटियों के बीच से रास्ता बनाते हुए यह मिसाइल 500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम बताई जाती है।

तेजस को लग सकता है

विशेषज्ञों का मानना है कि टॉरस मिसाइल को तेजस Mk1A और MkII में एकीकृत करना तकनीकी रूप से संभव है। ऐसा होने पर स्वदेशी लड़ाकू विमान भी लंबी दूरी से दुश्मन के अहम ठिकानों को निशाना बना सकेंगे। इससे वायुसेना को सीमित राफेल बेड़े पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और एक साथ कई मोर्चों पर कार्रवाई की क्षमता विकसित होगी।

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