सामान्य तौर पर 5 साल की होगी तैनाती
नई नीति के मुताबिक निर्माण संगठन में अधिकारियों का सामान्य कार्यकाल पांच साल रखा गया है। यदि किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए जरूरत महसूस होती है तो यह अवधि बढ़ाकर सात साल तक की जा सकती है। इस व्यवस्था का मकसद यह है कि परियोजना के बीच में अधिकारियों के तबादले कम हों और काम की निरंतरता बनी रहे। इससे बड़े रेल प्रोजेक्ट्स को तय समय में पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
केंद्रीय बोर्ड करेगा अधिकारियों का चयन
अब निर्माण विंग में अधिकारियों की तैनाती की प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया है। इसके लिए सेंट्रल सेलेक्शन बोर्ड बनाया गया है। निर्माण संगठन में काम करने के इच्छुक अधिकारी निर्धारित पोर्टल के जरिए आवेदन करेंगे। चयन के दौरान अधिकारियों की योग्यता, संबंधित क्षेत्र में अनुभव और पिछली कार्यप्रणाली जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा। इससे परियोजना की जरूरत के अनुसार उपयुक्त अधिकारियों की नियुक्ति करने की कोशिश होगी।
आधुनिक तकनीक की ट्रेनिंग जरूरी
रेलवे परियोजनाओं में नई तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अधिकारियों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया है। अधिकारियों को गति शक्ति विश्वविद्यालय से दो से तीन सप्ताह का अनिवार्य प्रशिक्षण लेना होगा और परीक्षा भी पास करनी होगी। प्रशिक्षण में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के साथ डिजिटल ट्विन्स, टनल, ब्रिज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों की जानकारी दी जाएगी।
पर्यावरण मंजूरी के लिए अलग व्यवस्था
रेल परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण और वन संबंधी मंजूरियों के कारण कई बार काम प्रभावित होता है। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक जोनल रेलवे में भारतीय वन सेवा और राजस्व अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर तैनात करने की योजना है। इसका उद्देश्य जरूरी मंजूरियों से जुड़े मामलों को तेजी से आगे बढ़ाना और परियोजनाओं में आने वाली प्रशासनिक बाधाओं को कम करना है।
दूरदराज में तैनात अफसरों को भी सुविधा
नई नीति में दूरदराज और कठिन इलाकों में तैनात अधिकारियों की सुविधाओं का भी ध्यान रखा गया है। ऐसे क्षेत्रों में अधिकारियों के लिए प्रीफैब्रिकेटेड आवास की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा, पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले अधिकारियों को आगे पोस्टिंग के लिए अपनी पसंद के तीन जोनल रेलवे का विकल्प देने का प्रावधान भी किया गया है।

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