पुराने कानून में बदलाव की जरूरत
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मौजूदा बीज अधिनियम 1966 का है, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था। कृषि क्षेत्र में इतने वर्षों में काफी बदलाव हो चुके हैं। सरकार का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में नकली और खराब गुणवत्ता वाले बीजों पर कार्रवाई के लिए पर्याप्त प्रभावी प्रावधान नहीं हैं। नए कानून के जरिए इस व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी है।
किसानों से लिए गए हजारों सुझाव
प्रस्तावित सीड बिल के मसौदे पर नवंबर-दिसंबर 2025 में आम लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे गए थे। सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब 18 हजार सुझाव मिले। अब किसान संगठनों के साथ सीधे बातचीत कर इन सुझावों को समझा जा रहा है। मंत्री ने साफ किया कि कानून को जल्दबाजी में अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा।
किसानों के बीज अधिकार रहेंगे सुरक्षित
सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि नए कानून का उद्देश्य किसानों के पारंपरिक बीजों के अधिकारों को खत्म करना नहीं है। किसान अपनी पारंपरिक और कृषक किस्मों के बीजों का इस्तेमाल, आपस में आदान-प्रदान और बिक्री कर सकेंगे। इनके लिए अनिवार्य पंजीकरण नहीं होगा। अपनी किस्म को पंजीकृत कराने की सुविधा स्वैच्छिक रखे जाने का प्रस्ताव है।
नकली बीज बेचने वालों पर कसेगा शिकंजा
प्रस्तावित कानून में बीज से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर अधिक प्रभावी दंड व्यवस्था बनाने की बात कही गई है। छोटी गलतियों के लिए चेतावनी और दोबारा गलती होने पर ज्यादा जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। सरकार का लक्ष्य ऐसा सिस्टम तैयार करना है, जिससे किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचे और नकली बीजों की बिक्री पर रोक लगाई जा सके।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसान संगठनों से मिले सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। जो सुझाव किसानों के हित में और व्यावहारिक होंगे, उन्हें अंतिम मसौदे में शामिल करने पर विचार किया जाएगा। सरकार का दावा है कि नए सीड बिल का मुख्य उद्देश्य किसानों के हितों की रक्षा के साथ देश में गुणवत्तापूर्ण बीज व्यवस्था को मजबूत करना है।

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